उस दिन अभिनव ने सोचा , जब मेरा ATM कार्ड दुबारा से बन जायेगा तो मैं उसकी मदद जरुर करूँगा ,उसे कुछ पैसे देकर। वो जो बहुत गरीब था ,बूढ़ा और ठीक से चलने में भी सक्षम नहीं था । फिर भी अपनी जीविका के लिए रेलवे स्टेशन पर छोटे -मोटे सामान बेच कर अपना खर्च चल रहा होगा। अभिनव उसे लोकल से आते -जाते रोज़ ही देखता था , लेकिन जिस दिन उसने उसकी सहायता करने कि सोची उसी दिन उसका एटीएम कार्ड कही गिर गया था। खैर कुछ दिनों बाद जब एटीएम कार्ड नया बन कर आया अभिनव काफी खुश था कि आज वो उसकी मदद कर पायेगा। रोज़ कि तरह आज भी वह इंसान अभिनव को वहीं मिला अपने समानों को बेचते हुए। अभिनव उसके पास गया कि उसे कुछ पैसे देने के लिए। लेकिन वहा पहुँच कर वो हिम्मत ही नहीं कर पाया उसे पैसे देने की। उसे लगने लगा जैसे वो उसकी खुद्दारी को चुनौती दे रहा है। इसके बदले उसने उससे कुछ चीजे ही खरीद ली ,जो अभिनव के मतलब की थी भी नहीं -------क्योकि वह उसकी मदद करना चाहता था बिना उसको उसकी नज़रो में गिराए। .......... और अभिनव इस बात से खुश भी था कि कम से कम वो अपना मेहनत करके खा रहा है.......
Friday, December 27, 2013
Tuesday, December 24, 2013
एक घटना जिसने मतलब ही बदल दिया दोस्ती का .......
आज अचानक याद आ गया फिर वही दिन .......बहुत छोटी थी मैं उस समय शायद ६ साल की। मेरे पिताजी का स्थानंतरण हो गया था। उस समय हमलोग बहराइच में एक छोटी सी जगह 'गिरजापुरी' में रहते थे। वहा से हमें डाकपत्थर (देहरादून ) जाना था। घर में सभी उत्साह से भरपूर्ण थे ,मैं भी थी ------लेकिन कही कुछ सता रहा था मुझे -----जिसकी तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जा रहा था--------वह और कुछ नहीं, मेरा मेरी दोस्त से अलग होना था ------मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है ,कैसे मेरी दोस्त 'साधना ' मुझे अपने घर ले गयी और जो भी उसको समझ आया मुझे बड़े प्यार से खिला रही थी ---घर में रक्खे बिस्कुट और पता नहीं क्या -क्या खिलाये जा रही थी फिर मुझे मेरे घर तक छोड़ने आयी। उसके बाद थोड़ी देर वह मेरे घर रुकी और फिर मैं उसको छोड़ने उसके घर गयी। और ये छोड़ने का सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक हमारे जाने का समय नहीं हो गया। लेकिन ये घटना मुझे इतनी परेशान कर गयी कि तब से आज तक मैं हिम्मत ही नहीं कर पायी कोई दोस्त बनाने की ---------- शायद डर था फिर से बिछड़ने का------और अब ये हिम्मत नहीं थी मुझमे--------
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